बेगूसराय: मतदाताओं की चुप्पी और भितरघात से बढ़ी प्रत्याशियों के दिल की धड़कन

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बेगूसराय,26 अप्रैल(हि.स.)। कथित राष्ट्रवाद, राष्ट्रद्रोह और सामाजिक न्याय के सियासी घमासान के कारण देशभर में चर्चित हो चुकी बेगूसराय लोकसभा सीट पर चौथे चरण में 29 अप्रैल को चुनाव होना है। चुनाव में अब मात्र दो दिन शेष रह गए हैं। शनिवार की शाम चुनाव प्रचार समाप्त हो जाएगा। यहां से दस प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनसमें मुख्यतया तीन प्रत्याशियों एनडीए के गिरिराज सिंह, सीपीआई के कन्हैया कुमार और राजद के तनवीर हसन के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है। चुनाव को लेकर लगातार शब्दबाण चलाए जा रहे हैं। एक-दूसरे पर हमला जारी है। बड़े-बड़े नेताओं का रोज कार्यक्रम हो रहा है लेकिन इन सबके बीच मतदाताओं की चुप्पी क्या गुल खिलाएगी कहना मुश्किल है। मतदाताओं की चुप्पी और दलों में भितरघात के कारण यहां की स्थिति और दिलचस्प होती जा रही है। इसके कारण राजनीतिक पंडितों के सारे गुना-भाग फेल हो रहे हैं।
एनडीए के प्रत्याशी केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के पक्ष में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की सभा हो चुकी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी लगातार जनसभाएं कर रहे हैं। इसके अलावा गिरिराज सिंह एवं तीनों प्रमुख दलों के कार्यकर्ता, नेता जी-जान से जनसंपर्क में दिन-रात एक किए हुए हैं। यूं तो इस बार बेगूसराय में दल, जाति और धर्म-सम्प्रदाय के सारे बंधन टूट रहे हैं लेकिन एनडीए में जबरदस्त भितरघात है। कुछ बड़े नेता चुनाव प्रचार में नहीं दिख रहे हैं। खंड-खंड में बंटी बेगूसराय भाजपा अखंड होकर गिरिराज सिंह को वोटिंग करेगी, इस पर संशय का बादल घिरा हुआ है। वहीं, कई प्रमुख कार्यकर्ता कन्हैया कुमार के लाल और तनवीर हसन के हरे रंग में रंग गए हैं। इससे भितरघात की पूरी संभावना है।
प्रत्याशी गिरिराज सिंह एक बार फिर बेगूसराय में कमल खिलाने के लिए नेताओं, कार्यकर्ताओं के साथ दिन-रात एक किए हुए हैं। बड़हिया के रहने वाले गिरिराज सिंह को बाहरी घोषित कर खारिज करने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन यह कितना संभव हो सकेगा यह चुनाव परिणाम ही बताएगा,जबकि हकीकत है कि गिरिराज सिंह का बचपन और राजनीतिक जीवन का अधिकतर हिस्सा बेगूसराय में गुजरा। यहां उनके कई रिश्तेदार हैं, पुराने समय से आरएसएस में सक्रियता के कारण उनकी पहचान है। भाजपा के सैकड़ों नेताओं से उनके पुराने संबंध भी हैं। यहां गिरिराज सिंह नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सलाहकार के रूप में उन्हें देखा जा रहा है।
दूसरे प्रमुख प्रत्याशी हैं जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और वामदलों के प्रत्याशी कन्हैया कुमार। कन्हैया की राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर की अपनी पहचान हो चुकी है। कन्हैया अस्ताचलगामी हो चुके वामपंथ को यहां स्थापित कर फिर से उदयाचल की ओर ले जाने के लिए जी-जान से लगे हुए हैं। उनके समर्थन में अतुल कुमार अंजान, सुधाकर रेड्डी, अमरजीत कौर, जावेद अख्तर, प्रकाश राज, शबाना आजमी, स्वरा भास्कर, जिग्नेश मेवाणी आदि ने दिन-रात एक कर दिया है। कन्हैया के प्रचार-प्रसार के लिए जेएनयू समेत कई अन्य विश्वविद्यालयों के अलावा स्वतंत्र रूप से भी देश के कोने-कोने से लोग आकर प्रचार में लगे हैं। कन्हैया खुद धुआंधार संवाद कर रहे हैं। तीसरे प्रमुख प्रत्याशी हैं महागठबंधन के राजद प्रत्याशी तनवीर हसन। पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे तनवीर हसन छात्र जीवन से ही सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता रहे। उनकी समाजवादी और सेकुलर विचारधारा के पोषक और दलों से गहरा नाता रहा है। पिछले चुनाव की गलतियों को दोहराए बिना ये अपनी जीत का परचम लहराने में तन-मन-धन से लगे हुए हैं। तनवीर हसन के पक्ष में तेजस्वी यादव, जीतन राम मांझी, शरद यादव, उपेन्द्र कुशवाहा और मुकेश सहनी जनसभा कर चुके हैं।
फिलहाल चुनाव प्रचार अंतिम दौर में है और देखना यह है कि बेगूसराय के 19 लाख 58 हजार 382 में से कितने मतदाता किस प्रत्याशी, दल और गठबंधन के पक्ष में ईवीएम का बटन दबाकर दिल्ली भेजने की राह तय करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक बेगूसराय में करीब चार लाख 30 हजार भूमिहार, दो लाख 80 हजार मुस्लिम, तीन लाख 50 हजार महादलित, एक लाख 50 हजार यादव, 70 हजार ब्राह्मण, 60 हजार राजपूत, 60 हजार मल्लाह, दो लाख वैश्य तथा दो लाख 50 हजार कोइरी, कुर्मी और कानू वोटर हैं। इन्हें अपने पक्ष में करने के लिए एनडीए जहां पिछले पांच सालों के विकास, राष्ट्रवाद और आतंकवाद पर प्रहार को मुद्दा बना रह है, वहीं महागठबंधन सामाजिक न्याय की बात कर रहा है जबकि वामपंथी बेगूसराय के स्थानीय मुद्दों, केंद्र सरकार द्वारा किए गए खोखले वादों को बताने के साथ कन्हैया की घोषणाओं को मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। खामोश मतदाता क्या गुल खिलाएंगे यह कहना किसी के लिए बहुत ही मुश्किल है।इसके करण प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ती जा रही हैं।

 


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