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हिंदुस्तान पहुंचकर पूरी हुई जिनके वतन और वजूद की तलाश!

नई दिल्ली  (हि.स.)। इन्हें अपने वतन की तलाश है। इन्हें अपने वजूद की खोज है। अल्पसंख्यकों के साथ पाकिस्तानी हुक़ूमत के व्यवहार का ये वो चेहरा हैं, जो नामालूम क़लमकार की बेनाम ख़बर बनकर रह गए। ये पाकिस्तान के उन दावों की अंतर्कथा भी हैं, जिसके वज़ीर-ए- आज़म अक़लियतों के साथ सुलूक को लेकर हिंदुस्तान को सीख देने की हरचंद कोशिश करते हैं। वतन और वजूद की इनकी तलाश, हिन्दुस्तान आकर पूरी तो हो गई लेकिन इनके लिए ये तय होना बाक़ी है कि सरहद के इस पार के मुक़म्मल नागरिक हैं।
दिल्ली का एक मेट्रो स्टेशन है मजलिस पार्क। दूर से ही दिख जाती है एक बस्ती, जहां पाक़िस्तान के अलग- अलग हिस्सों से आए शरणार्थियों ने पनाह ली है। सभी अलग- अलग दौर में और दीगर हालात में भारत आए। वे एकबार जो यहां आए तो अपने मुल्क़ लौटने के लिए हरगिज़ राज़ी न हुए। बक़ौल इनके `हमारी नस्ल ने तो अपनी औलादों के लिए अपनी ही ज़िंदग़ी में बाक़ायदा मरकर जन्नत पाई है… यहां से भी नाउम्मीद हुए तो कहां ठौर पाएंगे?’
यहां शरणार्थी की ज़िंदगी इन्हें मंजूर है। रोज़मर्रा की दुख- तक़लीफ और दुश्वारियां फिर भी कम नहीं है। मगर इन्हें सुकून है कि वे यहां महफूज़ हैं। झुग्गियां ही सही मगर इनके घरों में भी होली- दीवाली जैसे तीज- त्योहार आते हैं। हर सुबह अपनी मान्यताओं के मुताबिक मंदिरों की पूजा- प्रार्थना करते हैं। शरणार्थी शिविर की बुजुर्ग महिला मोहिनी हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हुई कहती हैं कि `ईश्वर बहुत बड़ा है… सबकी सुनता है, हमारी भी सुनेगा।’ वे अपने कुनबे के साथ 2013 में यहां आई थीं। पूछने पर कि क्या कभी अपने मुल्क़ की याद नहीं आती? शरणार्थी शिविर की दुश्वारियों के कारण कभी वापस लौट जाने का मन नहीं करता? छूटते कहती हैं, `…वहां क्या था जिसके छूट जाने का ग़म हो? किसी तरह यहां आकर तो ज़िंदग़ी मिली है, वहां लौटने के बारे में ख्वाब में भी नहीं सोचतीं।… यहां जैसी भी ज़िंदग़ी है, कम-से-कम है तो सही!’
मुख्य सड़क के ठीक किनारे बड़े हिस्से में शरणार्थियों की झुग्गियां हैं। बस्ती के भीतर जाने पर ज़िंदग़ी हरगिज़ आसान नहीं दिखती। टूटी- फूटी झुग्गी- झोपड़ियां… रस्सियों पर टंगे फटे, मैले- कुचैले कपड़े… कुछेक दीवारों पर हीरो- हिरोइन के एकाध पोस्टर शायद इस बेनूर ज़िंदग़ी में कुछ रंग घोलने के इरादे से लगाए गए। बरामदे पर ही गृहस्थी के नाम पर कुछ छोटे- बड़े प्लास्टिक के डिब्बे… स्टील और कांसे के थोड़े से पुराने बर्तन… कई परिवारों का साझा चूल्हा और इधर- उधर से चुनकर लाई गई लड़कियों से रसोई के इंतज़ाम में जुटी महिलाएं। इधर- उधर घूमते छोटे- छोटे बच्चे और धूप में बैठे कुछ बड़े- बुजुर्ग। कुल मिलाकर यही है शरणार्थी शिविर का हासिल।
इसके बाद भी यहां ज़िंदग़ी धड़कती है। 13 साल का युवराज क्रिकेट का शौक़ीन है। सरकारी स्कूल में सातवीं में पढ़ता है। मोबाइल को लेकर बालसुलभ उत्सुकता उसमें दिखती है। कहता है कि पाक़िस्तान में उसकी पहचान के बच्चे ये जानकर काफी खुश होते हैं कि वह यहां स्कूल भी जाता है। उसकी पहचान वाले ज्यादातर हिंदू परिवारों के बच्चे ही हैं। पाकिस्तान में रहते हुए कभी वो पढ़ नहीं पाता, इसका वो ज़िक्र करना नहीं भूलता। हालांकि बस्ती में ही उसने एक छोटी-सी दुकान खोल ली है, जहां टंगी हुई सस्ती किस्म की चायपत्ती के पैकेट, बिस्किट, टॉफियां, थोड़े बहुत अनाज के डिब्बे आपको बग़ैर पूछे बता देंगे कि यहां क्या- क्या सामान उपलब्ध है।
इस बस्ती में रहने वाले ज्यादातर लोगों के नाम पूछने पर किसी ने अपना नाम शंकर बताया तो किसी ने अर्जुन। किसी ने भगवानदास तो किसी ने हरिचंद। इन परिवारों में पहले हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर बच्चों के नाम रखे जाने का जैसे रिवाज़ –सा था। मगर अब नए ज़माने के नाम भी खूब रखे जा रहे हैं। हालांकि इस बस्ती में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक राम-राम से आपका अभिवादन करेंगे। बस्ती की शुरुआत ही मंदिर से होती है। मंदिर के बाहर बजरंग बली की मूर्ति लगी हुई है। घर भले साफ- सुथरे न भी हों लेकिन मंदिर की नियमित साफ- सफाई दिख जाती है।
मंदिर के बाहर एक तखत पर शंकर धूप में लेटा हुआ है। जवान शंकर की मां अफसोस के साथ वहीं खड़ी वीरान पड़ी रेहड़ी की तरफ इशारा कर बताती है कि `छह महीने से बिस्तर पर है। कमाने वाला जवान बेटा बिस्तर पर पड़ा है… चार महीने पहले बुखार का दौरा पड़ा था, तब से पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया।‘ एक नौजवान चंदर ने बताया कि वो यहां के स्थानीय बाजार में रेहड़ी लगाता है, जहां मोबाइल के कवर और शीट बेचता है। आमदनी रोज़ाना दो- ढाई सौ रुपये की हो जाता है। स्थायी दुकान खोलने की उसकी बड़ी हसरत है।
बस्ती के प्रधान नेहरूलाल ने बताया कि सबसे पहले यहां आने वाला उनका ही कुनबा था। वे 2013 में कुंभ देखने राजस्थान बॉर्डर से आए थे लेकिन फिर लौटने का कोई भी इरादा कभी नहीं किया। वे कहते हैं कि `हमने तो वहां से चलते वक़्त ही सोच लिया था कि दोबारा लौटकर नहीं आना। ज़िंदगी और मौत जो भी मिलेगी, हिंदुस्तान में ही रहेंगे।’ वे इसबात पर तल्ख हो जाते हैं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान कहते हैं कि वे भारत को सिखलाएंगे कि अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। गुस्से में भरकर वे इमरान ख़ान को झूठे और मक्कार बताते हैं। थोड़ी देर बाद गुस्से को जब्त कर संयत होकर कहते हैं कि अगर वहां महफूज़ रहते तो हम जैसे लोग अपना घरबार छोड़कर यहां क्यों पनाह लेते? वे मानते हैं कि उनके पूर्वजों ने 1947 में बंटवारे के बाद वहां रुककर इतनी बड़ी गलती की थी कि उसका खामियाजा हमारी और उसके बाद की पीढ़ियां भुगत रहे हैं। अब तसल्ली है कि अपने बड़े- बुजुर्गों की ग़लती, उनकी नस्ल ने हिंदुस्तान में पनाह लेकर सुधार कर ली है। वे कहते हैं कि उनका बेटा नहीं पढ़ पाया तो भी उन्हें यक़ीन है कि उनका पोता जरूर यहां की आबोहवा में पल-बढ़कर क़ामयाब इंसान बनेगा।
इस शिविर के लोगों को अहसास है कि तालीम से ही तरक्क़ी की राह खुलती है। ऐसा वे ख़ुद बताते हैं कि यहां आकर इसका अहसास हुआ। इसलिए शिविर में एक टाट- पट्टी वाला स्कूल अरसे से चल रहा है, जिसमें चार- पांच साल के बच्चे- बच्चियां सुबह शाम रट्टा लगाते हैं। इन बच्चों के लिए पढ़ाई, किसी खेल की तरह ही मनोरंजक है।
बस्ती के एक अन्य बुजुर्ग सोना दास का कहना है कि यहां जैसी भी ज़िंदग़ी है, उन्हें कुबूल है… पाकिस्तान लौटने की कभी सोचते भी नहीं। वे कहते हैं कि `यहां सरकार सिर्फ हमें अपना नागरिक मान ले यही बहुत है… बाकी कोई भी सरकार किसी को भी बिठाकर खिला तो नहीं सकती। हम भी यहां अपनी मेहनत से अपनी ज़िंदग़ी चलाएंगे। हम वहां किसानी करते थे यहां भी नागरिकता मिलने पर वे किसी सूबे में किसानी की ख़्वाहिश रखते हैं।’ पंजाब- हरियाणा या राजस्थान के आसपास खेतीबारी कर उन्हें ज़िंदग़ी संवारने की हसरत है। वे भारतीय सियासतदानों का धन्यवाद भी करते हैं कि उन्हें नागरिक के रूप में भारतीय पहचान देने के मामले में नर्म रुख़ रखते हैं।

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