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कितने गरीबों को मिलेगा ‘आयुष्मान भारत’ योजना का लाभ!

कड़ी निगरानी नहीं होगी तो बीमा कम्पनी,चिकित्सालयों,चिकित्सकों का रैकेट होगा मालामाल

नई दिल्ली,24 सितम्बर(हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने झारखंड की राजधानी रांची में कल 23 सितम्बर को विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना ‘आयुष्मान भारत’ / ‘प्रधानमंत्री जन अरोग्य योजना’ का शुभारंभ कर दिया। विश्व में चीन के बाद सबसे अधिक जनसंख्या भारत की होने और चीन में जितने चाहे उतने बच्चे पैदा करने पर बंदिश के बाद भारत ही ऐसा देश है जहां बच्चा पैदा करने की सबसे अधिक प्रगति जारी है। यही गति रही तो अगले कुछ वर्ष में चीन से भी अधिक जनसंख्या भारत की हो जाएगी। तब भारतवासी व उसके हुक्मरान गर्व से सीना तान कर कह सकेंगे कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और सबसे बड़ी जनसंख्या का रिकार्ड भारत के पास है। यह अलग बात है कि जब यहां की जनसंख्या विश्व में सबसे अधिक रहेगी, तो गरीब भी सबसे अधिक संख्या में भारत में ही होंगे। जनसंख्या के हिसाब से आज भी विश्व में सबसे अधिक गरीब आबादी भारत में है।
गरीबों को ही मिलेगा ‘आयुष्मान भारत’ का लाभ
प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया की सबसे बड़ी जिस स्वास्थ्य बीमा योजना का शुभारम्भ किया है, उसका लाभ केवल उसको ही मिलेगा जो गरीब है। अब सवाल यह है कि गरीब कौन है। इसमें कई पेंच हैं। सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना हुए 07 साल बीत गए हैं। यह हुआ था 2011 में। उसके बाद यदि कोई गरीबी रेखा से ऊपर का परिवार, व्यक्ति गरीब हो गया होगा, तो इसका लाभ उसे नहीं मिलेगा। यदि अभी कोई नया गरीब हुआ होगा तो भी नहीं मिलेगा। क्योंकि 2011 के जनगणना में जो गरीब तय किये गये हैं या चिह्नित किये गये हैं, वे ही लोग इसके पात्र हैं।
सवाल यह कि भारत में गरीब कौन है
भारत में विश्व की गरीब आबादी का तीसरा हिस्सा रहता है। जनसंख्या अधिक तो इसके व भ्रष्टाचार आदि के कारण गरीबी भी अधिक। इधर 2011 के सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में गरीब के तौर पर चिह्नित किए गए सभी लोगों को इसके लिए पात्र माना गया है। इसका मतलब यह भी है कि अगर कोई आदमी 2011 के बाद गरीब हुआ है, तो वह इसके फायदे से वंचित हो जाएगा।
विश्व बैंक के 2010 के आंकड़े के अनुसार भारत में कुल आबादी का 68.7 प्रतिशत लोग यानि 132 करोड़ में से लगभग 90 करोड़ लोग प्रतिदिन 140 रुपये से कम में गुजर-बसर करते हैं।
भारत सरकार के नीति आयोग के विवादास्पद व चर्चित आंकड़े के अनुसार देश में अब शहर में प्रतिदिन 28 रुपये 65 पैसे तथा गांवों में प्रतिदिन 22 रुपये 42 पैसे खर्च करने वाले को गरीब नहीं कहा जा सकता। इसके अनुसार शहर में एक माह में 859 रुपये 60 पैसे तथा गांव में 672 रुपये 80 पैसे से अधिक खर्च करने वाला आदमी गरीब नहीं है। यानि शहर में रहने वाला आदमी जो एक वर्ष में 10,316 रुपये खर्च करता है और गांव में रहने वाला आदमी जो एक वर्ष में 8,074 रुपये खर्च करता है वह गरीब नहीं है।
वैसे इन आकड़ों पर बहुत विवाद है। क्योंकि योजना आयोग / नीति आयोग में बैठाये गये साहबों पर अपने को नियुक्त करने वाली सरकार व आकाओं के राज में गरीबी को कम दिखाने का दबाव होता है। इसके लिए इनको तरह-तरह की तरकीब निकालकर गरीबी के आंकड़े कम करने की बाजीगरी करनी पड़ती है। जिसमें से सबसे आसान है किसी व्यक्ति का एक दिन में कम पैसे में रहने /खर्च करने का आंकड़ा बना देना। जैसे कि इस देश में केवल हुक्मरानों और साहबों की ही हर कुछ वर्ष बाद वेतन ,महंगाई भत्ता, मकान, यात्रा आदि सुविधा बढ़ती जानी चाहिए| इससे उलट गरीबी कम होती दिखाने के लिए, गरीबों की संख्या कम दिखाने के लिए,उनका आंकड़ा कम करने के लिए गरीब जनता के जीने के लिए प्रतिदिन रुपये खर्च करने का आंकड़ा कम होता जाना चाहिए। यही किया जा रहा है। इसके कारण गरीबी रेखा तय करने को लेकर आज भी विवाद है।
बीएचयू प्रबंध शात्र संस्थान के पूर्व डीन डा. छोटे लाल का कहना है कि भारत में गरीबों की संख्या पर अलग-अलग अनुमान हैं। महंगाई दर में लगातार बढ़ोतरी के कारण कुछ अर्शास्त्री कहते हैं कि भारत की 77 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। जबकि कुछ कहते हैं कि 37 प्रतिशत नीचे है।
इस बारे में संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे सीए व जलाधिकार संस्था के प्रमुख कैलाश गोदुका का कहना है कि हर सरकार और उसके द्वारा नीति आयोग या अन्य जगह नियुक्त किये गये अर्थशास्त्री या नौकरशाह आंकड़ों में हेर-फेर करके गरीबों की संख्या कम होने का आंकड़ा बताते व बात कहते हैं। ताकि यह प्रचारित किया जा सके कि वर्तमान सरकार के राज में, तथाकथित सुशासन में इतने कल्याणकारी कार्य हुए और वे कार्य इतने प्रभावी हुए कि देश की इतनी प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से ऊपर उठ गई। इसके चलते गरीबी कम हो गई। वैसे भी महीने के खर्च पर गरीबी रेखा तय करना उचित नहीं है।
मरीजों के फर्जी उपचार के नाम पर भुगतान का हो सकता है घोटाला
कैलाश गोदुका का कहना है कि ऐसी योजनाओं में पहले बहुत घोटाले हुए हैं। यह होता है गलत तरह से धंधा करने वाले चिकित्सालयों के मालिकों, प्रबंधकों, चिकित्सकों, बीमा कर्मचारियों,बीमा कम्पनियों आदि की मिलीभगत से। इसमें कई बार मरीज को भर्ती दिखा बिल बनवा बीमा कम्पनी से भुगतान करवा लिया जा जाता है। पहले की इस तरह की कई योजनाओं में ऐसे घोटाले हुए हैं। इसलिए मोदी सरकार को आयुष्मान भारत योजना पर कड़ी निगरानी रखनी होगी, वरना यह बहुत से चर्चित चिकित्सालयों, चिकित्सकों, बीमा कम्पनियों के लिए लूट का बड़ा माध्यम बन जाएगा।

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